बुधवार, 12 मार्च 2014

157. अपने ही 'फेसबुक वाल' से-

अपने इस ब्लॉग पर "जय हिन्द" का साइनबोर्ड लगाकर मैंने यह तय किया था कि अब इस पर कुछ नहीं लिखना है. यहाँ तक कि फेसबुक पर लिखी गयी राजनीतिक किस्म की बातों को भी कुछ समय बाद मैं हटा देता था. मगर अब अहसास हुआ कि यह ठीक नहीं. तो इस ब्लॉग पर फिर से लिखना शुरु कर रहा हूँ. शुरुआत अपने ही फेसबुक वाल की कुछ पोस्ट्स से-
शासक
अकबर भले कम पढ़ा-लिखा था, मगर वह विद्वानों को पहचानना, उन्हें सम्मान देना तथा उनके योग्य कार्य देना जानता था- बीरबल, टोडरमल, मानसिंह, तानसेन, अब्दुल रहीम, अबुल फजल, इत्यादि- सबकी प्रतिभा को उसने पहचाना, उनका सम्मान किया और उनकी विद्वता, योग्यता के अनुसार उन्हें कार्य दिया बदले में अकबर एक महान शासक बना, जिसका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है
मेरे ख्याल से, शासक ऐसे ही होने चाहिए वह खुद अर्थशास्त्री, अभियन्ता इत्यादि हो, चाहे न हो, मगर उसके पास एक तो "विजन" होना चाहिए और दूसरे, उसे चाहिए कि वह "सही व्यक्ति का चुनाव कर उसे सही स्थान पर" पहुँचा दे... बाकी सब अपने-आप ठीक हो जायेगा
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इतिहास में शेरशाह के शासन-प्रशासन की बहुत प्रशंसा मिलती है क्या सत्ता सम्भालने के बाद मंत्री से लेकर सन्तरी तक सभी सरकारी कर्मियों को उसने बदल दिया होगा? ऐसा तो नहीं लगता उसने खुद ईमानदारी से काम करना शुरु किया होगा और मंत्रियों, सेनापतियों को भी ईमानदारी के लिए बाध्य किया होगा आगे इनलोगों ने अपने अधिकारियों को बाध्य किया होगा ईमानदारी के लिए और उससे आगे अधिकारियों ने अपने कर्मियों को बाध्य किया होगा
प्रसंगवश, राजनीति में सुधार "ऊपर से" ही आता है "नीचे से" आप बस छोटे-मोटे बदलाव ही ला सकते हैं
कहते हैं कि एक तरफ शेरशाह की दण्ड-प्रणाली बहुत कठोर थी, तो दूसरी तरफ उसने सड़कें बनवायी, छायादार पेड़ लगवाये, सराय बनवायीं, प्याऊ बनवाये और मनुष्यों की कौन कहे, जानवरों के भी अस्पताल बनवाये!  
यानि शासक को जहाँ एक तरफ "वज्र से भी कठोर होना चाहिए"- गलत करने वालों के प्रति; वहीं आम लोगों के प्रति उसे "फूल से भी कोमल" होना चाहिए
मेरे ख्याल से, शासक को ऐसा ही होना चाहिए, तभी वह सिर्फ 5 साल राज करके भी इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो जाता है- शेरशाह की तरह...
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पोरस को पराजित करने के बाद सिकन्दर की जनसभा आयोजित हुई थी उसके सेनापति ने सिकन्दर की वीरता की प्रशंसा की तक्षशिला विश्वविद्यालय का एक छात्र वहाँ उपस्थित था उसने भरी सभा में सिकन्दर की वीरता को चुनौती दी और कहा कि वह सिकन्दर के साथ द्वन्द मुकाबला करना चाहता है- सिकन्दर कोई भी हथियार चुन ले
उस युवा छात्र की बातों को टाल दिया गया। कहा गया कि युवक किसी सेना में सैनिक बन जाय- उसे कभी-न-कभी अवसर मिल जायेगा सिकन्दर से युद्ध करने का। बात आयी-गयी हो गयी
मगर वहाँ उपस्थित उसी विश्वविद्यालय के एक आचार्य ने उस छात्र की शूरवीरता को पहचान लिया
वे आचार्य थे- चाणक्य और वह छात्र था- चन्द्रगुप्त!
बाकी इतिहास है.....
शासक को साहसी होना ही चाहिए- मातृभूमि के सम्मान की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगाने से भी उसे पीछे नहीं हटना चाहिए वर्ना वह राजनीति की न ही सोचे, तो बढ़िया....
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7वीं सदी के समुद्रगुप्त को मैं अपना आदर्श मानता हूँ और हमेशा यह सपना देखता हूँ कि भारत फिर वैसा ही बने, जैसा 7वीं सदी में था- कला, संगीत, विज्ञान, गणित, स्थापत्य, व्यवसाय, उद्योग, कृषि... हर विधा में, हर क्षेत्र में देश का डंका बज रहा था दुनिया में...
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मतदान
प्रायः सभी समाचारपत्रों और समाचार चैनलों ने इस आशय की मुहिम चला रखी है कि हमें मतदान में जरुर-से-जरुर भाग लेना चाहिए.
मगर मेरे मन से सवाल है. मुझे यह बताया जाय कि मेरे मतदान का "उद्देश्य" क्या होना चाहिए- क) अपने क्षेत्र के लिए योग्य जनप्रतिनिधि का चुनाव करना या ख) देश के लिए योग्य प्रधानमंत्री का चुनाव करना?
अगर मेरी पसन्द का क्षेत्रीय जनप्रतिधि तथा भावी प्रधानमंत्री दोनों अलग-अलग पार्टियों से हों, तो मुझे क्या करना चाहिए?
चूँकि यह लोकसभा चुनाव है, इसलिए मुझे प्रधानमंत्री के चयन को प्राथमिकता देनी चाहिए, मगर इसके लिए हो सकता है कि मुझे अपने क्षेत्र के एक ऐसे उम्मीदवार को मत देना पड़े, जिसे मैं पसन्द नहीं करता हूँ. ऐसे में लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धान्तों का क्या हुआ?
क्या चुनाव प्रणाली में ही गड़बड़ी नहीं है?
क्या कोई मुझसे यह कह सकता है कि जबतक अमृत न मिले, जहर पीते रहो?

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यहाँ प्रसंगवश मैं प्रो. अरूण कुमार (जे,एन.यू.) के विचारों को साभार उद्धृत कर रहा हूँ:
"पूरी लोकतांत्रिक प्रणाली अत्यंत महंगी होती जा रही है. विधायकों और सांसदों की विलासित बढ.ती जा रही है. नेताओं की सुरक्षा पर खर्चे बढे. हैं. अरबपति सांसदों की संख्या बढ. रही है. राजनीतिक दलों को हजारों करोड. रुपये के चंदे मिल रहे हैं. यह धनतंत्र है या लोकतंत्र? धनतंत्र के सहारे देश का भला कैसे हो सकता है?...
"भारत में राजनेता अपने आप को शासक मानते हैं, जबकि यूरोप तथा अमेरिका में नौकरशाह और राजनेता खुद को पब्लिक सर्वेंट मानते हैं....
"पूरी व्यवस्था कुछ लोगों के हाथों में सिमट गयी. देश में संभ्रांत वर्ग केंद्रित नीति अपनायी गयी. इससे संसद में करोड.पति सांसद आने लगे. राजनीतिक पार्टियां अमीरों का संगठन बन कर रह गयीं....
"असल में विकास का मौजूदा मॉडल सही नहीं है. यह लोकतंत्र नहीं बल्कि धनतंत्र है. इसी धनतंत्र के कारण नक्सलवाद फैल रहा है. सत्ता के लिए आम लोगों की बुनियादी जरूरतों की बजाय कॉरपोरेट के हित महत्वपूर्ण हो गये हैं....
"मौजूदा शासन प्रणाली और सोच को बदलने की जरूरत है."
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कुल-मिलाकर मैं "शासन-प्रणाली" तथा "सोच" बदलने का हिमायती हूँ. प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद-विधायक के चयन की एक अलग प्रणाली का मैंने पूरा खाका बना रखा है.
     
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जात-पाँत
हो सकता है, यह मेरा भ्रम हो, या मेरी जानकारी दुरुस्त न हो, मगर मुझे लगता है कि सातवीं सदी में (जो भारत का स्वर्णयुग था) लोगों को उनकी "जाति" से नहीं आँका जाता होगा.
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यह बुराई शुरु हुई होगी बारहवीं-तेरहवीं सदी से, जब भारत का पतन शुरु हुआ.
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आगे अगर भारत का पुनरुत्थान होता है, तो फिर ऐसा समय आयेगा कि लोग एक-दूसरे को उनकी जाति से नहीं आँकेंगे.
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कहने का तात्पर्य, भारत के उत्थान-पतन तथा जातिवाद की सरलता-कठोरता के बीच एक गणितीय सम्बन्ध होना चाहिए.... जिसे 'ग्राफ' में व्यक्त किया जा सके...
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आगे, आप सभी हमसे ज्यादा विद्वान हैं...

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पुराना तोड़े बिना नया सम्भव नहीं 
साथियों, मोह-माया त्यागिये... महान लोकतंत्र और महान संविधान की बेहोशी से जागिये...
हो सके, तो इस लेख को जरुर पढ़िये-
एक उद्धरण:
"...1947 का अनफिनिश्ड एजेंडा है मित्रों. उस समय आजादी की लड़ाई से थके-मांदे लोग पुराने को ही स्वीकार कर, दक्षिण एशिया की अपनी सामाजिक विशिष्टताओं की उपेक्षा कर तात्कालिक संतुष्टि को ही प्राथमिकता दे बैठे. नये के निर्माण की जद्दोजहद नहीं उठा सके. शायद थक गये थे वे लोग.

आजादी की लड़ाई थकाने वाली हो गयी थी. गांधी-विनोबा की बातें भी अनसुनी हो गयी. 1952 के प्रथम आम चुनाव ने नरेंद्रदेव, जयप्रकाश, लोहिया, रामनंदन जैसे परिवर्तन के नायकों को रिजेक्ट कर दिया था. सोशलिस्ट पार्टी जिसके पास नये का विजन-डॉक्युमेंट था, रिजेक्ट हो चुकी थी. तब से 66 साल बीत चुके हैं. हम कॅम्प्रोमाइजेज करते गये. अपने संविधान और व्यवस्था में चिप्पियां लगाते गये. लेकिन मौलिक रूप से ढांचा वही पुराना था.

नयी समाज-व्यवस्था, नयी शासन-व्यवस्था, नयी शिक्षा-व्यवस्था, सब कुछ नया. पुराने को अलविदा कहना ही होगा मित्रों. पुराना अब किसी काम के लायक ही नहीं रहा. इतना ही नहीं, पुराना जहर घोल रहा है...."
(पूरे लेख के लिए लिंक: http://www.prabhatkhabar.com/news/83026-story-article.html

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी ये प्रस्तुति बढ़िया लगी मुझे :-)

    इतिहास तो बीता हुआ कल होता, उस समय क्या हुआ और कौन कैसा था ? ये तो कोई भी लगभग सटीक नहीं बता सकता है बस तथ्यों के अनुसार ही हम इसकी विवेचना कर सकते है जो हम इतिहास विषय के अन्तर्गत पढ़ते है। सादर।।

    नई कड़ियाँ : 25 साल का हुआ वर्ल्ड वाइड वेब (WWW)

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  2. आपकी इस प्रस्तुति को आज कि अल्बर्ट आइंस्टीन और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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