गुरुवार, 16 मई 2013

139. प्रधानमंत्री 'अपर हाऊस' से: भला क्यों?



       हो सकता है कि 'सत्ता-हस्तान्तरण' के समय कुछ दवाब रहा हो अँग्रेजों की तरफ से, जिस कारण भारत की शासन-प्रणाली के रुप में बर्तानवी संसदीय प्रणाली का चयन किया गया। इस प्रणाली में कोई बुराई भी नहीं है। हाँ, सम्राट या साम्राज्ञी की नकल करते हुए राष्ट्रपति का पद सृजित करना जरूरी नहीं था। इस पद को बनाना भी था, तो इसे "आडम्बरयुक्त" नहीं बनाना था। भारत-जैसे देश के लिए, जहाँ दो-तिहाई आबादी गरीब हो, सम्राटों वाले आडम्बर से युक्त राष्ट्रपति का पद या तो "सफेद हाथी" हो सकता है, या फिर आम जनता के जख्मों पर छिड़का गया नमक- और कुछ नहीं!
       खैर, यहाँ मुद्दा कुछ और है। सवाल है कि क्या बर्तानवी संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है कि वहाँ 'अपर हाऊस' (हाऊस ऑव लॉर्ड्स) से भी कोई प्रधानमंत्री बन सकता है? या, ब्रिटिश संसदीय प्रणाली के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण है, जब किसी 'लॉर्ड' को ब्रिटेन का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया हो?
       अगर कोई जानकार इस जिज्ञासा का उत्तर दे सकें, तो मेहरबानी होगी। मुझे लगता है कि ब्रिटेन के संविधान में ऐसा प्रावधान नहीं होगा और न ही वहाँ की संसदीय-प्रणाली में ऐसा कोई उदाहरण मिलेगा।
       अगर मेरा अनुमान सही है, तो फिर सवाल उठता है, भारतीय नीति-निर्धारकों ने इस प्रावधान को संविधान में क्यों शामिल किया कि अपर हाऊस (राज्यसभा) का भी सदस्य प्रधानमंत्री बन सकता है? अगर इस प्रावधान को शामिल किया भी- किसी अनदेखी 'आपात्कालीन' परिस्थिति के बारे में सोचकर- तो साथ में इस शर्त को क्यों नहीं जोड़ा कि ऐसा प्रधानमंत्री 6 महीनों के अन्दर किसी एक लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेगा और चुनाव में विजयी होने के बाद ही वह इस पद पर कायम रहेगा, अन्यथा उसे जाना पड़ेगा? मेरे हिसाब से, यही तो 'लोकतंत्र' है!
       सब जानते हैं कि राज्यसभा के सदस्यों को जनता प्रत्यक्ष रुप से नहीं चुनती। ऐसे में, राज्यसभा के सदस्य को लम्बे समय के लिए देश का प्रधानमंत्री बनाना क्या लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धान्तों का उल्लंघन नहीं है?
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       कुछ सिद्धान्त सार्वभौम किस्म के होते हैं- वे हर जगह लागू होते हैं। ऐसा ही एक सिद्धान्त है- जो नौकरी देता है, उसी के हाथों में नौकरी छीनने का भी अधिकार होता है। साथ ही, जो नौकरी देता है, वफादारी उसी के प्रति रखनी पड़ती है।
       लोकतंत्र में उक्त सिद्धान्त को लागू करने पर हम पाते हैं कि चूँकि जनता प्रधानमंत्री को चुनती है, इसलिए जनता के ही हाथों में उसे हटाने का भी अधिकार होता है। (भले इस अधिकार के इस्तेमाल का अवसर 5 साल में एकबार ही क्यों न मिले!) इसी प्रकार, चूँकि जनता प्रधानमंत्री को चुनती है, इसलिए प्रधानमंत्री जनता के प्रति वफादारी दिखाता है और उसकी आकांक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करता है।
       अब जरा पिछले एक दशक से भारत में कायम स्थिति पर नजर डालें। जो प्रधानमंत्री हैं, उन्हें जनता ने नहीं चुना है, इसलिए जनता उन्हें हटा भी नहीं सकती। वे फिर राज्यसभा के लिए चुन लिये गये- जनता देखती रह गयी। (चुने भी जाते हैं आसाम से, जबकि वे वहाँ के निवासी नहीं हैं- दस्तावेज पर गौहाटी के एक कमरे का किरायेदार बनकर वे राज्यसभा में आसाम का प्रतिनिधित्व करते हैं।) चूँकि उन्हें जनता ने नहीं चुना है, इसलिए जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतरने की परवाह भी उन्हें नहीं हैं।
तकनीकी रुप से वे अपनी जगह सही हैं- मुझे जिसने पद पर बिठाया है, उसी के प्रति वफादारी दिखाऊँगा, उसी की आकांक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करूँगा और उसी के कहने पर इस पद को छोड़ूँगा। इसमें गलत क्या है?
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अन्त में- अगर तो ब्रिटिश संविधान में अपर हाऊस से प्रधानमंत्री चुनने का प्रावधान है, या ब्रिटिश परम्परा में हाऊस ऑव लॉर्ड्स से कभी कोई प्रधानमंत्री चुना गया है, तब तो कोई खास बात नहीं है; लेकिन ऐसा न होने पर यही समझना चाहिए कि हमारे नीति-निर्धारकों की "मंशा" साफ नहीं थी। उन्होंने "पिछले दरवाजे" (बैकडोर) या "छिद्र" (लूपहोल) के रुप में हमारे संविधान में इस प्रावधान को जोड़ा था, जिसका एक बहुत ही बुरा परिणाम आधी सदी बाद आज हमारी पीढ़ी भोग रही है।
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1 टिप्पणी:

  1. फेसबुक पर / 6.10.13 को-

    पहले जनभावना का अनादर किया जाय और फिर उसी भावना को जब एक स्वयंभू युवराज प्रकट करे, तो उसे शिरोधार्य किया जाय- ऐसा तो ग्रेट ब्रिटेन में भी नहीं होता होगा, जहाँ कि राजघराने को वैधानिक मान्यता मिली हुई है और जहाँ की जनता बेशक, भारतीयों के मुकाबले ज्यादा राजभक्त होती है!
    लोकतंत्र के किस सिद्धान्त के तहत ऐसा किया गया?
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    दूसरी बात, पिछले दिनों मुझे पता चला कि ब्रिटिश साम्राज्य के गुलाम रहे (यानि राष्ट्रमण्डल के सदस्य) किसी भी देश ने "अध्यादेश" की परिपाटी को नहीं अपनाया है- सिर्फ भारत ही है, जिसने (अँग्रेजों के 1935 के अधिनियम से, जिस पर कि हमारा संविधान आधारित है) इस साम्राज्यवादी अस्त्र को अपना रखा है!
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    मैंने अपने ब्लॉग में एकबार यह भी लिखा था कि जरूर ब्रिटिश संविधान में "हाउस ऑव लॉर्ड्स" (अपर हाउस) से किसी को प्रधानमंत्री चुनने का प्रावधान नहीं होगा! होगा भी तो चार-छह महीनों के अन्दर चुनाव जीतकर "हाउस ऑव कॉमन" (लोअर हाउस) की सदस्यता लेना उसके लिए अनिवार्य किया गया होगा!
    मगर हमने "पिछले दरवाजे" वाले इस "छिद्र" (लूपहोल) का आविष्कार किया- अपने संविधान में!
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    और फिर, पिछले दिनों हमारी न्यायपालिका संविधान की एक उपधारा को ही रद्द कर चुकी है- दागी जनप्रतिनिधियों वाली, जिसपर कि बवाल मचा हुआ है.
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    इन सबके बावजूद कोई मुझसे कहे कि अपने संविधान को "महान" कहो, अपने लोकतंत्र को "महान" कहो, तो माफ किया जाय... मुझसे तो यह नहीं होगा...

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