रविवार, 17 मार्च 2013

117. "सत्य सेल्यूकस, .........."



       बच्चियों, किशोरियों, युवतियों, महिलाओं के साथ- यहाँ तक कि विक्षिप्त महिलाओं तथा विदेशी मेहमान महिलाओं के साथ- नित्य होने वाले लोमहर्षक दुष्कर्मों, वीभत्स सामूहिक दुष्कर्मों के बारे में सुन-सुन कर दिमाग भन्ना गया है
       दुष्कर्म के बाद आमतौर पर पीड़िता की जघन्य हत्या कर दी जाती है, या वे खुद ही आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाती हैं, या फिर, समाज और व्यवस्था उसे तिल-तिल कर मारती है।
       इक्के-दुक्के मामलों में दुष्कर्मी को सजा होती है, वह भी मामूली, और उसमें भी जमानत या पैरोल पर रिहा होकर दुष्कर्मी मजे करता है। (सन्दर्भ- बिट्टी मोहान्ति मामला।)
       ध्यान रहे कि दुष्कर्म की उन्हीं घटनाओं को हम जान पाते हैं, जो राष्ट्रीय समाचारपत्रों में छपती हैं, या जिन्हें टीवी पर समाचार चैनल वाले दिखाते हैं। इनकी संख्या रोज होने वाली ऐसी घटनाओं का एक प्रतिशत भी होती है या नहीं- सन्देह है।
       दुष्कर्म के अलावे महिलाओं पर तेजाब भी फेंका जाता है, दहेज के लिए उत्पीड़ित किया जाता है तथा और भी बहुत तरह के अत्याचार महिलाओं पर किये जाते हैं। इनमें भी ज्यादातर महिलाओं को जान से हाथ धोना पड़ता है और दोषी को शायद ही वाजिब सजा मिल पाती है।
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       इन दुष्कर्मों, अत्याचारों के लिए 1. समाज और 2. व्यवस्था, दोनों समान रुप से जिम्मेदार हैं।  
       "समाज" इसलिए जिम्मेदार है कि इसमें रहने वाले हम लोगों का नैतिक एवं चारित्रिक पतन हो गया है। इस पतन के कारण तो बहुत सारे हैं, मगर एक शब्द में कहना हो, तो यही कहा जायेगा कि हमारा नैतिक एवं चारित्रिक पतन इसलिए हो रहा है कि हम भी दुनिया के अन्यान्य बहुत-से देशों की तरह "भौतिकवाद" की चकाचौंध भरी मगर वास्तव में अन्धी दौड़ में शमिल हो गये हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है कि हमारी सरकारों के एजेण्डे में देश का भौतिक विकास तो शामिल है, मगर देशवासियों की नैतिक, चारित्रिक एवं आध्यात्मिक उन्नति उनके एजेण्डे में दूर-दूर तक कहीं शामिल नहीं है
       "व्यवस्था" इसलिए जिम्मेदार है कि प्रशासन, पुलिस और न्याय व्यवस्था करीब-करीब चरमरा गयी है। इन तीनों व्यवस्थाओं के पंगु होने के पीछे जो कारण है, वह यह है कि देश की राजसत्ता गलत लोगों के हाथों में चली गयी है। राजसत्ता में गलत लोगों का प्रभुत्व इसलिए कायम हो गया है कि हमारी चुनाव प्रणाली दूषित है। अब यहाँ शाश्वत समस्या यह है कि जिन गलत लोगों का राजसत्ता में प्रभुत्व कायम हो गया है, वे चुनाव प्रणाली के दोषों को दूर नहीं होने देंगे।
       इस प्रकार, हम पाते हैं कि सिर्फ महिलाओं के प्रति दुष्कर्म ही नहीं, बल्कि देश की प्रायः सभी समस्याओं का जो "पूर्णकालिक" समाधान है, वह यह है कि देश की राजसत्ता सही लोगों के हाथों में सौंपी जाय। फिलहाल यह "पूर्णकालिक" समाधान दूर की कौड़ी नजर आती है।
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       हाल-फिलहाल तो महिलाओं को "तात्कालिक" समाधान से काम चलाना पड़ेगा। इसके तहत महिलाओं को सरकार, प्रशासन, पुलिस और अदालत से कोई उम्मीद नहीं रखनी होगी। इसके बदले उन्हें अपने पर्स या हैण्डबैग में (सौन्दर्य सामग्रियों के साथ-साथ) पेपर-कटर, पेंचकस या ऐसी ही कुछ चीजों को रखना होगा, जिनका प्रयोग आपात्कालीन परिस्थितियों में हथियार के रुप में किया जा सके।
       मुझे वाकई उस दिन तसल्ली मिलेगी, जिस दिन मैं यह समाचार सुनूँगा कि एक किशोरी ने पेपर-कटर से हमला करके तीन मनचलों को बुरी तरह घायल कर दिया; या, एक युवती ने छेड़खानी करने वाले एक युवक के पेट में छह ईंच लम्बा पेंचकस घोंप दिया; या फिर, एक महिला ने बलात्कार करने की कोशिश कर रहे आदमी के अण्डकोष पर अपने घुटनों से वार करके उसे सदा के लिए नपुँसक बना दिया।
       ठीक है कि ऐसा करने वाली महिलायें फिर शायद सामान्य जीवन न बिता सके, मगर दो बातों पर विचार करके देखा जाय- 1. ऐसी दो-चार खबरें आने के बाद मनचले तथा आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोग क्या सपने में भी छेड़खानी या दुष्कर्म करने का साहस जुटा पायेंगे? और 2. धूप से तपती धरती पर गिरने वाली बरसात की पहली बूँदों को क्या फनाह नहीं होना पड़ता है? यानि क्या भगत सिंह यह सोचकर क्रान्तिकारी बने थे कि देश को आजाद कराने के बाद वे इसका प्रधानमंत्री बनेंगे? जाहिर है, किसी-न-किसी को तो पहल करने ही होगी... दूसरों के लिए।
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       ऊपर मैंने कहा कि महिलाओं के प्रति दुष्कर्म ही नहीं, बल्कि देश की प्रायः सभी समस्याओं का जो "पूर्णकालिक" समाधान है, वह है राजसत्ता को सही लोगों के हाथों में सौंपना। यही नहीं, सत्ता पर काबिज गलत लोगों को निकाल बाहर कर उन्हें निकोबार के किसी टापू पर निर्वासित करना भी जरुरी है।
       मुझे नहीं लगता कि एक तानाशाह, एक डिक्टेटर के अलावे कोई और इस काम को कर सकता है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए स्पष्ट लग रहा है कि अगर समाज के लोगों का नैतिक, चारित्रिक एवं आध्यात्मिक उत्थान करना है; प्रशासन, पुलिस और न्याय व्यवस्था को चाक-चौबन्द, त्वरित एवं न्यायप्रिय बनाना है, तो दस वर्षों की एक तानाशाही की स्थापना करनी ही होगी।  
...और इस तरह की जनकल्याणकारी तानाशाही की स्थापना- बेशक, 10 वर्षों के लिए- तभी हो सकती है, जब देश के नागरिक व सैनिक कन्धे से कन्धा मिलाकर, कदम से कदम मिलाकर सड़कों पर उतरें। जब मैं 'नागरिक' कह रहा हूँ, तो मेरा आशय 'आम' लोगों, खासकर युवाओं से है, न कि अन्ना हजारे या स्वामी रामदेव-जैसे जन-नेताओं से, जो बात-बात पर आमरण अनशन करने लगते हैं और प्रेरणा पाने के लिए राजघाट पहुँच जाते हैं; इसी प्रकार, जब मैं 'सैनिक' कह रहा हूँ, तो मेरा ईशारा 'जवानों' तथा उनके सूबेदारों से है, न कि जेनरलों से, जो सत्ता पर काबिज गलत लोगों की साजिशों में शामिल होने (सन्दर्भ: हेलीकॉप्टर घोटाले में पूर्व वायुसेना प्रमुख के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल होना) को मजबूर हो जाते हैं, जबकि "देश की भलाई" के लिए उन्हें सत्ता पर काबिज गलत लोगों के कान उमेठने चाहिए।
       मैं पूरे होशो-हवास में अपने ये विचार प्रकट कर रहा हूँ- अगर यह बगावत है, तो अपने देश की भलाई के लिए मैं बागी भी बनने के लिए तैयार हूँ।
नेताजी सुभाष ने भी तो ब्रिटिश सरकार से भीख माँगकर, थोड़ा-थोड़ा करके आजादी लेने से इन्कार किया था, फिर मैं क्यों उम्मीद रखूँ कि ये बिल, वो बिल पास करके; यह कानून, वह कानून बनाकर; इसे हटाकर, उसे बैठाकर देश की समस्याओं का समाधान किया जा सकता है? क्या पैंसठ साल कम थे इन सबके लिए? हजारों तो कानून बन गये, हर विचारधारा वाले को सत्ता पर बिठाया गया- कहीं रत्ती भर भी कुछ बदला? अगस्त'1947 में जिन समस्याओं से हम जूझ रहे थे, वे तो जस के तस कायम हैं ही, दर्जनों नयी समस्यायें हमारा जीना मुहाल कर रही हैं।
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       दुर्भाग्य यह है उस समय देश के "नागरिक" तथा ब्रिटिश सेना के भारतीय "जवान", दोनों ही नेताजी सुभाष के सन्देश को ग्रहण नहीं कर पाये थे और वे अप्रैल' 44 में बगावत करने से चूक गये, जब नेताजी इम्फाल-कोहिमा सीमा पर युद्ध करते हुए भारत में प्रवेश करना चाहते थे। उनदिनों भारतीय तीन भ्रमों के शिकार थे- पहला भ्रम: "ब्रिटिश साम्राज्य अभी सैकड़ों वर्षों तक कायम रहेगा।" जबकि विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवाद समाप्त हो जायेगा और उपनिवेशों को आजादी देनी पड़ेगी- यह दीखने लगा था। दूसरा भ्रम: "विश्वयुद्ध के बाद विजयी देश होने के कारण ब्रिटेन और भी ज्यादा शक्तिशाली राष्ट्र बन जायेगा।" जबकि वस्तविकता यह थी कि अमेरिका और सोवियत संघ के रुप में दो नयी शक्तियों के उभरने के स्पष्ट संकेत मिलने लगे थे। तीसरा भ्रम: "ब्रिटिश न्यायप्रिय होते हैं, वे जो करेंगे अच्छा ही करेंगे।" जबकि वास्तविकता यह थी कि ब्रिटिश बहुत ही शातिर कमीन थे, जिन्होंने इस देश के संसाधनों को बुरी तरह निचोड़ा था। ...और जाते-जाते भी वे भारत को शारीरिक-मानसिक रुप से अपंग, अपाहिज बनाकर ही गये।
... और आज भी मेरे "बागी" विचार से सहमत होने वाला कोई नहीं है- मेरे अपने, मेरे करीबी तक नहीं। प्रसंगवश, मैं सेना में रहा हूँ- वहाँ भी कोई मेरे विचार से सहमत नहीं होता था।
       ऐसा इसलिए है कि आज भी हम भारतीयों के दिलो-दिमाग पर "तीन महान भ्रमों" ने कब्जा कर रखा है-
पहला भ्रम: "15 अगस्त 1947 को देश को "आजादी" मिली थी।" जबकि वास्तविकता यह है कि उसदिन "सत्ता-हस्तांतरण" हुआ था और सांकेतिक रुप से ही सही, मगर हमारा देश आज भी ब्रिटेन का एक डोमेनियन स्टेट है, जिस कारण हम आज भी पाकिस्तान, श्रीलंका तथा अन्यान्य पूर्व ब्रिटिश उपनिवेशों में अपने "राजदूत" नहीं भेज सकते- हम वहाँ "उच्चायुक्त" भेजते हैं।
दूसरा भ्रम: "हमारा संविधान एक महान संविधान है।" जबकि वास्तविकता यह है कि इसका दो-तिहाई हिस्सा (प्रायः 70 प्रतिशत अंश) '1935 का अधिनियम' है, जिसे अँग्रेजों ने एक 'गुलाम' देश पर 'राज' करने के लिए बनाया था, न कि एक स्वतंत्र एवं संप्रभु राष्ट्र को खुशहाल, स्वावलम्बी और शक्तिशाली बनाने के लिए।
तीसरा भ्रम: "हमारे देश में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली कायम है।" जबकि वास्तविकता यह है कि हमारे जनप्रतिनिधि अपने चुनाव क्षेत्र के प्रायः दो-तिहाई (70 प्रतिशत) मतदाताओं का प्रतिनिधित्व "नहीं" करते हैं और हमारे संसद में बैठने वाले लगभग साढ़े पाँच सौ जनप्रतिनिधि देश की जनता की भलाई के लिए नीतियाँ नहीं बनाते, बल्कि 5-7 शक्तिशाली सांसदों की एक "किचन कैबिनेट" विश्व बैंक, आईएमएफ, ड्ब्ल्यूटीओ तथा अमीर देशों के दलाल बनकर पूँजीपतियों, उद्योगपतियों तथा बहुराष्ट्रीय निगमों को फायदा पहुँचाने और देश के संसाधनों को लूटने की नीयत से नीतियाँ बनाते हैं।
जब तक देशवासियों के दिलो-दिमाग से इन भ्रमों का सफाया नहीं हो जाता, इस देश में बदलाव की गुंजाइश एक रत्ती भी नहीं है।
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इतना सब पढ़कर अगर आपको यह लगे कि मैं अनर्गल प्रलाप कर रहा हूँ, तो मैं सिर्फ इतना कहूँगा कि दो हजार साल पहले इस देश को जानने-समझने के बाद सिकन्दर ने अपने सेनापति से ठीक ही कहा था कि- "सत्य सेल्यूकस, क्या विचित्र यह देश है!"
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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही कहा है आपने आभार मृत शरीर को प्रणाम :सम्मान या दिखावा .महिलाओं के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

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  2. अब ऐसी जघन्य घटनाएं दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है,......इस तरह की घृणित विकृति की भयानक घटनाएं झकझोर जाती है अंतर्मन को ये दिमाग के जोड़-जोड़ हिलाकर रख देती है ,ये किस तरह की मानसिक विकृति का परिणाम है. जो एक ५ साल की बच्ची को भी सिर्फ एक जिस्म समझता है क्या कोई इंसान इतना नीच हो सकता है गिद्ध नोचता मुर्दे को ये दरिन्दे तो जीते जी इंसानों को नोच रहे है क्या चरित्र है, क्या नैतिकता जिससे इनका दूर दूर तक वास्ता ही नहीं आज देश के प्रतिदिन के घटनाक्रम को देखें तो लगता है कहाँ जंगल राज में बस रहे है बेहद दुःख विशाद बेबसी क्रोध बस समझ नहीं आता किया क्या जाए ऐसे में सवाल ये है कि इस भ्रष्ट सिस्टम को कैसे बदला जाए, अपराधी गुनाह करता है. उसे पुलिस पकड़ती है. सजा कोर्ट देता है पर सजा दिलवाने की जिम्मेदारी किसकी है यह अभी तक किसी को नहीं पता ... अपने समाज में ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जहां अपराधियों को तुरंत चिह्नित किया जा सके. जहां उन्हें बिना समय गंवाए सजा दिलाई जा सके. ऐसी घटनाओं की सजा क्या हो? यह समाज को डिसाइड करना है. जनचेतना को जाग्रत होने की आवश्यकता है इस समय दोषियों को तेज गति से सजा मिले आदमी सोच के ही कांप जाए.

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