सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

नकली नोट तथा कालाधन बनाम 'विमुद्रीकरण'



(पिछले हफ्ते बरहरवा जाते समय साहेबगंज स्टेशन के बुक स्टॉल पर एक पत्रिका पर नजर पड़ी- "प्रथम प्रवक्ता", नोएडा से प्रकाशित। जो अंक मेरे हाथ लगा, वह 1-15 फरवरी 13 का है- कवर स्टोरी न्यायपालिका पर है- "न्याय: कोर्ट में सब होल्ड"। इस लेख से काफी कुछ उद्धृत करने की इच्छा है, मगर शुरुआत पीछे छपे आलेख "देश में नकली नोट प्रकरण से आर्थिक हाहाकार" से।)  

ऐसे हुई नकली नोटों की शुरुआत
       "देश में नकली नोट का सम्बन्ध 1991 से प्रारम्भ आर्थिक सुधार से माना जा रहा है। उदारवाद के बाद चार कम्यूनिस्ट पार्टी एवं काँग्रेस समर्थित संयुक्त मोर्चे की सरकार को सन 1996-97 में 3,35,900 करोड़ रुपये की नयी मुद्रा छपवाने की आवश्यकता पड़ी। संयुक्त मोर्चा सरकार ने काले धन की समाप्ति के लिए स्वैच्छिक आय उजागर योजना (वीडीआईएस) शुरु की। वीडीआईएस में लगभग 33,000 करोड़ रुपये का काला धन सामने आया। आरबीआई के टकसाल की क्षमता 2,16,575 करोड़ रुपये की थी, जिससे विदेशों से 1,20,000 करोड़ रुपये के नोट छपवाने माँग हुई। यह अहम प्रश्न है कि काँग्रेस, चारों कम्यूनिस्ट पर्टियाँ विदेशों से नोट छपवाने पर क्यों सहमत हुईं?
       "इंग्लैण्ड की थॉमस डेलारू से 13,650 लाख 100 रुपये के नोट, जीएसके एण्ड डेव्रिएट कन्सोर्टियम से 16,000 लाख 500 रुपये के नोट और अमेरिकी बैंक नोट कम्पनी से 6,350 लाख 100 रुपये के वाटरमार्क वाली मुद्रा छपवाने का इन्तजाम किया गया।
       "भारतीय मुद्रा छापने वाली विदेशी कम्पनियों को स्पष्ट निर्देश था कि वे भारतीय नोट की प्लेट, स्याही, वाटरमार्क कागज भारत सरकार को सौंपेंगी। वैसे, इंग्लैण्ड की कम्पनी डेलारू देश-विदेशों की सरकारों के नोट छापती है। नमित वर्मा (आर्थिक विशेषज्ञ) का प्रश्न यह है कि भारतीय नोट छापने वाली कम्पनियों ने प्लेट लौटायी अथवा नष्ट की या नहीं?"
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"विमुद्रीकरण": एक तीर से दो शिकार 
ऊपर के उद्धरण से पता चलता है कि अगर देश को मुद्रा की जरुरत है, तो वह दो काम कर सकती है- 1. काले धन के रुप में छुपी मुद्रा को बाहर निकाले, और 2. नयी मुद्रा छपवाये। 1996-97 में हमारी सरकार ने दोनों कामों में लापरवाही दिखायी- 1. सारे काले धन को जब्त करने की कोशिश नहीं की गयी, और 2. विदेशों में मुद्रा छपवायी गयी। नतीजा हम देख ही रहे हैं।
जबकि "विमुद्रीकरण" एक ऐसा रास्ता है, जिससे एक ही बार में दोनों समस्याओं (काला धन तथा मुद्रा की कमी) का समाधान पाया जा सकता है, जैसा कि मैंने अपने "घोषणापत्र" में लिखा भी है-
7.6              नये किस्म के नोट छपवा कर प्रचलित नोटों को रद्द किया जायेगा और कम-से-कम समय के अन्दर इन नोटों की अदला-बदली की जायेगी।
7.7              अदला-बदली के दौरान एक हजार रुपये से कम की राशि को डाकघर की शाखाओं में तथा पाँच हजार रुपये से कम की राशि को बैंकों की शाखाओं में हाथों-हाथ बदला जायेगा।
7.8              पाँच हजार रुपये तथा इससे बड़ी राशि को पास बुक के माध्यम से बदला जायेगा- यानि, पुराने नोटों को जमा करके नये नोटों का भुगतान लेना पड़ेगा।
7.9              पचास हजार रुपये से अधिक की राशि को बदलने के लिये आयकर विभाग की मंजूरी अनिवार्य होगी।
7.10          भविष्य में प्रत्येक बीस वर्ष में एक बार विमुद्रीकरण की इस प्रक्रिया को दुहराने की व्यवस्था की जायेगी।
7.11          बैंक और बैंक-जैसी संस्थाओं में लॉकर की व्यवस्था समाप्त की जायेगी, या फिर, इसकी गोपनीयता समाप्त कर दी जायेगी। 
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