रविवार, 13 जनवरी 2013

अब उम्मीद नहीं...


कहा गया था कि ‘फास्ट ट्रक कोर्ट’ में प्रतिदिन सुनवाई होगी, मगर यहाँ हफ्ते दस दिन की तारीख मिलनी शुरु हो गयी। आगे चलकर महीने-दो महीने पर भी तारीख पड़ने लगे, तो आश्चर्य नहीं!
तीस-तीस गवाहों की पेशी होगी, उनसे सवाल-जवाब किये जायेंगे, दुनिया भर के गौण और निरर्थक मुद्दे उठाये जायेंगे और इस प्रकार महीने दर महीने गुजर जायेंगे.... तारीख पर तारीखें पड़ती रहेंगी...
क्या मजाल जो हमारी न्यायपालिका अपना एक घण्टा, जी हाँ एक घण्टा भी इस मुद्दे पर खर्च कर दे कि “अभियुक्त दोषी है या नहीं?” इस मुद्दे से तो उसे कभी मतलब ही नहीं होता- किसी भी लम्बित मुकदमे का इतिहास उठाकर देख लीजिये। बस गौण मुद्दों पर बहस चलती रहती है।
न्याय को एक “जीवित” अवधारणा होना चाहिए, यह सिर्फ “शब्दों” में नहीं होता- मगर यहाँ देख लीजिये- एक आरोपित का मुकदमा “किशोर न्यायालय” में चल रहा है, मानो, उसने स्कूल में किसी सहपाठी की पिटाई कर दी हो!
अगर साल भर बाद यह फास्ट ट्रैक कोर्ट फैसला दे भी दे, तो मामला फिर हाई कोर्ट जायेगा, फिर सुप्रीम कोर्ट, और फिर लौटकर निचले कोर्ट में आयेगा। फिर दुबारा एक चक्कर लगेगा। इसमें करीब एक साल और लगेगा। अन्त में, ‘दया याचिका’ दाखिल होगी। इसमें कम-से-कम तीन-चार साल पर निर्णय होगा।
जैसे, दामिनी की दुर्दशा पर पीसीआर वैन के पुलिसवालों को दया नहीं आयी थी; जैसे सफदरजंग अस्पताल के आपात्कालीन/रात्रिकालीन ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों ने दामिनी की दर्दनाक स्थिति पर तरस नहीं खाया था; जैसे हमारे राजनेताओं के भावों में  दामिनी काण्ड से कोई परिवर्तन नहीं आया; ठीक उसी प्रकार, हमारे न्यायाधीशों को भी फर्क नहीं पड़ता इस बात से कि उन दरिन्दों ने बलात्कार के बाद दामिनी के शरीर के अन्दर लोहे का सरिया घुसाकर और फिर हाथों से उसकी आँतों को खींचकर बाहर निकालने की कोशिश की थी- ताकि उनकी मर्दानगी की निशानी न बच जाय.... इन सबके लिए दामिनी सिर्फ और सिर्फ एक "केस" है बस! इससे ज्यादा कुछ नहीं
कुल मिलाकर, मैं “दामिनी काण्ड” में त्वरित सुनवाई एवं कठोरतम सजा की उम्मीद का आज त्याग करता हूँ और इस शेर को याद करता हूँ- “बड़ा शोर सुनते थे पहलू में ज़िग़र का, जो चीरा तो इक क़तरा-ए-खूँ निकला।”
***
एक आम आदमी के हिसाब से मैं देखता हूँ, तो पाता हूँ कि यह एक ऐसा मामला है, जिसका निर्णय 100 घण्टों के अन्दर आ जाना चाहिए था और फैसले में ही "दया याचिका" के विकल्प को खारिज किया जाना चाहिए था; क्योंकि- 

·         यह दुनिया का जघन्यतम बलात्कार है,
·         पीड़िता ने मृत्यु से पहले अपना बयान दर्ज करा दिया है, 
·         चश्मदीद गवाह ने दरिन्दों की पहचान कर ली है, 
·         छह में से तीन नरपिशाचों ने जुर्म कबूल कर लिया है, 
·         सारे परिस्थितिजन्य साक्ष्य उन चाण्डालों के खिलाफ हैं, 
·         देशभर में- तीन तरह के लोगों को छोड़कर*- आक्रोश है- सभी शीघ्रतम समय में कठोरतम सजा माँग रहे हैं उन जालिमों के लिए, 
·         जनता के डर से सरकार ने फास्ट ट्रैक कोर्ट बना दिया है और पुलिस ने (आजाद भारत के इतिहास में शायद पहली बार) ईमानदारी से समय पर आरोपपत्र दाखिल कर दिया है,   
·         सारी दुनिया की निगाहें इस मामले पर टिकी हुई हैं,
·         चिकित्सा एवं फोरेन्सिक जाँच की रिपोर्ट भी उन कमीनों के खिलाफ है, 


इन सबके बावजूद अगर हमारी न्यायपालिका अपनी आदत के अनुसार मामले को लम्बा... बहुत लम्बा खींच ले जाये, तो मुझे तो लगता है यह बर्दाश्त के बाहर की बात होगी. 


नोट-

* जो तीन तरह के लोग आक्रोशित नहीं हैं, वे हैं- 

1. खाप पंचायत वाले, जिनका दिमाग नहीं होता, जो हर बलात्कार के लिए लड़कियों को जिम्मेदार मानते हैं. ये फाँसी का विरोध खुलकर कर रहे हैं. 
2. राजनेता, जो बहुत ही घाघ होते हैं, एक तीर से दो नहीं, 20-20 निशाने साधते हैं, जो पक्के मगरमच्छ होते हैं- आदमी को निगल जायें, डकार न लें और फिर आँसू बहायें. ये किसी रासायनिक बन्ध्याकरण की सजा की माँग कर रहे हैं. सवाल है- यह ऑपरेशन करेगा कौन?- तो सरकारी डॉक्टर. और क्या सरकारी डॉक्टर की मजाल है, जो वह एक सजा पाये राजनेता को नपुँसक बना दे? वह तो बिना कुछ किये "नपुँसकता प्रमाणपत्र" दे देगा और कोर्ट उस प्रमाणपत्र को ही सही मानेगा. 
3. दानवाधिकारवादी, जो फिलहाल तो डर के मारे बिस्तरों के नीचे दुबके हुए हैं, मगर जैसे ही आक्रोश जरा ठण्डा होगा और जैसे ही दरिन्दों को फाँसी मिलेगी, ये बाहर आ जायेंगे और लगेंगे मृत्युदण्ड का विरोध करने.

1 टिप्पणी:

  1. नेता कमीने
    शोहदें होशियार
    शहीद ना हों
    आम इंसान ,क्या हो ?
    शाबाश प्रजातंत्र !!

    आपको मकर संक्रांति की ढेरों शुभकामनायें

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