शनिवार, 1 दिसंबर 2012

"आधार": एक षड्यंत्र?



साल-दो साल पहले जब मैंने किसी के पास आधार कार्ड देखा था, तब मैं चौंक गया था; क्योंकि इस पर स्पष्ट लिखा था- "आधार पहचान का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं(Aadhaar is proof of identity, not of citizenship)। मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ा था। जब सरकार मतदाता पहचान-पत्र बनवा ही रही है नागरिकों के लिए, तब आधार कार्ड पर खर्च करने के पीछे कोई तुक मुझे नजर नहीं आया था- वह भी निजी कम्पनियों के माध्यम से।
बाद में खबर आयी- आधार कार्ड की योजना को बन्द कर दिया गया है। मुझे लगा- यह तो होना ही था। फिर बाद में खबर आयी- आधार कार्ड की योजना को दुबारा हरी झण्डी मिल गयी है। (सम्भवतः इस बार न्यायपालिका से भी हरी झण्डी मिली हुई है।)
मुझे लगा कि मैं निरा मूर्ख हूँ, इसलिए मुझे इस कार्ड को देखकर आश्चर्य हुआ था- जबकि देश में कोई भी इस पर आपत्ति दर्ज नहीं करा रहा है।
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मगर आज के दैनिक प्रभात खबर में एक आलेख देखा- "नकद सही, पर 'आधार' नहीं", जिसके लेखक हैं- अश्वनी महाजन (एसोसियेट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय)। आधार कार्ड पर वे लिखते हैं-
नकद सब्सिडी देने की पूरी योजना आधार कार्ड पर आधारित है। आधार कार्ड बनाने का जिम्मा कुछ संस्थाओं और कम्पनियों को सौंपा गया। देश में रहने वाला कोई भी व्यक्ति अपना आधार कार्ड बनवा सकता है, इसके लिए देश की नागरिकता का कोई प्रमाण नहीं देना पड़ता। पड़ोस में बँगलादेश से बड़ी संख्या में लोग सीमा पार कर भारत में बसे हैं। ऐसे में आधार कार्ड के आधार पर नकद सब्सिडी के अन्तरण का लाभ भारत के नागरिकों के साथ-साथ विदेशियों को भी मिल सकता है।
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तो क्या आधार कार्ड के पीछे कोई षड्यंत्र है? क्यों इसी के आधार पर नकद राज-सहायता (मजाक में जिसे वोट के बदले नोट कहा जा रहा है) दी जायेगी और मतदाता पहचान-पत्र के आधार पर नहीं- वह भी ऐन आम चुनाव से पहले?
हो सकता है, बहुतों को यह एक मामूली बात लगे, मगर मेरी नजर में यह एक बहुत ही खतरनाक चाल है। हमारी न्यायपालिका ने इस पर क्यों आँखें मूँद रखी है- यह मेरी समझ से बाहर है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. साभार:
    राकेश कुमार सिंह (फेसबुक पर)
    11 सितंबर पर 04:49 अपराह्न

    आधार कार्ड के बारे में मेरी एक जिज्ञासा शांत करिये विद्वान मित्रगण। मन लीजिये मेरा लड़का १४ वर्ष का और वह बड़ा होकर भारत के लिए जासूसी करना चाहता है और रॉ या किसी जाँच संस्था में भर्ती हो गया. मैंने उसका आधार कार्ड बनवा दिया जिसमे उसकी पुतली के निशान भी लिए गए. पेशे के अनुसार वह अमेरिका या किसी देश में छद्म रूप से जासूसी के लिए भर्ती हो गया. सुनने में आया था की अमेरिका के जाँच एजेंसी के सेवानिवृत्त अधिकारी ही इस कार्ड के निर्माण में येन० जी० ओ० के रूप में कार्य कर रहे है. किसी कारण वर्ष आधार कार्ड के डेटा अमेरिका या किसी अन्य देश को मिल गए, और मेरा लड़का के ऊपर यदि उन्हें शक हो गया तो वे तो तुरंत भारतीय जासूसों की पहचान कर लगे. क्या हश्र होगा उसका। मै यह समझाता था की सुप्रीम कोर्ट और इस मामले में चौथी दुनिया में छपी रिपोर्टो के आधार पर देश की सर्वश्रेष्ठ ख़ुफ़िया एजेंसी और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ता (शायद किसी हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज है ) से परामर्श के बाद इसे इस सरकार को लागू करना चाहिए अर्थात पुनर्विचार करना। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ इस योजना वर्तमान सरकार द्वारा भी अनुमोदन करने पर इसका प्रमाण सहित विरोध करने वाले महानुभाव जागरूक नागरिक रहस्य्मयी चुप्पी साध गए. जबकि अमेरिका सहित कई प्रभावशाली राष्ट्र इस योजना को ख़ारिज कर चुके है. इस बाबत संसद में चर्चा करानी चाहिए। यैसा भी संदेह व्यक्त किया गया की यह एक अंतरास्ट्रीय साजिश के तहत भारत में लागू करवाया गया. यदि यह सत्य है तो क्या अब भी सजिसकर्ता इतने पहुँच वाले है की पुनः मोहर लगवा ली. मेरी समझ में नहीं आता एक व्यक्ति के कितने पहचान बनेगे। पैन कार्ड, वोटर कार्ड को ही विस्तार दे दीजिये आधुनिक कर दीजिये।

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  2. यह कार्ड ख़तरनाक है : पार्ट-1

    चौथी दुनिया ने अगस्त 2011 में ही बताया था कि कैसे यह यूआईडी कार्ड हमारे देश की सुरक्षा के लिए ख़तरनाक है. दरअसल, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने इसके लिए तीन कंपनियों को चुना- एसेंचर, महिंद्रा सत्यम-मोर्फो और एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन का उदाहरण लेते हैं. इस कंपनी के टॉप मैनेजमेंट में ऐसे लोग हैं, जिनका अमेरिकी खु़फिया एजेंसी सीआईए और दूसरे सैन्य संगठनों से रिश्ता रहा है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन अमेरिका की सबसे बड़ी डिफेंस कंपनियों में से है, जो 25 देशों में फेस डिटेक्शन, इलेक्ट्रॅानिक पासपोर्ट आदि जैसी चीजों को बेचती है. इस कंपनी के डायरेक्टरों के बारे में जानना ज़रूरी है. इसके सीईओ ने 2006 में कहा था कि उन्होंने सीआईए के जॉर्ज टेनेट को कंपनी बोर्ड में शामिल किया है. ग़ौरतलब है कि जॉर्ज टेनेट सीआईए के डायरेक्टर रह चुके हैं और उन्होंने ही इराक़ के ख़िलाफ़ झूठे सबूत इकट्ठा किए थे कि उसके पास महाविनाश के हथियार हैं. सवाल यह है कि सरकार इस तरह की कंपनियों को भारत के लोगों की सारी जानकारियां देकर क्या करना चाहती है? एक तो ये कंपनियां पैसा कमाएंगी, साथ ही पूरे तंत्र पर इनका क़ब्ज़ा भी होगा. इस कार्ड के बनने के बाद समस्त भारतवासियों की जानकारियों का क्या-क्या दुरुपयोग हो सकता है, यह सोचकर ही किसी के भी दिमाग़ की बत्ती गुल हो जाएगी.

    - See more at: http://www.chauthiduniya.com/2013/03/this-card-is-dangerous-part-3-the-base-card-is-baseless.html#sthash.ctTUwylk.dpuf

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