बुधवार, 18 जुलाई 2012

मेरी आशा, आशंका और योजना



      मैं आशा करता हूँ कि आगामी 25 जुलाई को अन्ना हजारे जी के नेतृत्व में होनेवाला देशव्यापी आन्दोलन सफल हो; सरकार एक सशक्त लोकपाल का गठन करे, जो आगे चलकर व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक फैले भ्रष्टाचार का खात्मा कर सके- कम-से-कम अंकुश लगा सके। मगर मुझे डर है कि ऐसा कुछ नहीं होगा- सरकार छल-बल-कौशल से इस आन्दोलन को विफल बना देगी।
      इसी प्रकार, आगामी 9 अगस्त को स्वामी रामदेव के नेतृत्व में होने वाली क्रान्ति के बारे में भी मैं आशा रखता हूँ कि यह सफल हो; सरकार देश-विदेश में छुपे कालेधन का राष्ट्रीयकरण करे, जिससे कि आगे चलकर सड़क, रेल, पुल, नहर, बिजली, विद्यालय, अस्पताल इत्यादि के निर्माण के लिए लम्बे समय तक पैसे की कमी न हो। मगर मुझे डर है कि इस आन्दोलन को भी सरकार साम-दण्ड-भेद के सहारे कुचल देगी।
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      यह सही है कि अनशन से सिंहासन हिलते हैं, मगर राजा की आँखों में पानी होना चाहिए। ब्रिटिश सरकार ने भारत को लूटा, मगर उसकी आँखों में पानी था- ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं। हमारी आज की सरकार निर्लज्ज है- अनशन, सत्याग्रह से इसके कानों में जूँ तक नहीं रेंगेगी।
हाँ, अनशन करते हुए अगर कोई प्राण त्याग दे, तो शायद सरकार के कानों में जूँ रेंगे। तब भी सरकार को झुकाने के लिए आठ-नौ लोगों को बलिदान देना होगा। फिल्म ‘गुलामी’ में धरम जी के डायलॉग को याद किया जा सकता है-
      धूप से तपी धरती पर गिरने वाली बरसात की पहली बूँदों को तो फनाह होना ही पड़ता है!
      मगर मुझे डर है कि अन्ना जी, स्वामी जी, या उनके दल के सदस्यगण ऐसी स्थिति के लिए तैयार नहीं हैं।
      अब पलटकर मुझसे न पूछा जाय कि मैं खुद बलिदान देने के लिए तैयार हूँ या नहीं। जी नहीं, मैं खुद को अनशन करते हुए शहीद नहीं कर सकता था। ‘गुलामी’ के बहुत दिनों बाद सन्नी देओल ने फिल्म ‘बॉर्डर’ में एक डायलॉग बोला, जो मुझे सही लगता है-
      दुनिया की कोई भी जंग मरकर नहीं जीती जाती! जंग जीती जाती है- दुश्मन को मारकर!
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      मैं आशा करता हूँ कि 2014 के आम चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी जी देश के प्रधानमंत्री बने; देश की कमान थामने के बाद वे- 1.) देश की अर्थव्यवस्था को विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के चंगुल से बाहर निकालें, 2.) घरेलू संसाधनों एवं प्रतिभा के बल पर ही सूई से लेकर जहाज तक के निर्माण में स्वदेशीकरण को अपनायें, 3.) देश में जड़ें जमा चुकी बहुराष्ट्रीय निगमों को देश से निकाल बाहर करें, 4.) खेतीहर मजदूरों एवं सीमान्त किसानों को जमीन दिलाते हुए खेती योग्य जमीन का पुनर्वितरण करें, 5.) सरकारी वेतनमान में न्यूनतम व अधिकतम वेतन-भत्तों-सुविधाओं के बीच 1:15 से ज्यादा का अन्तर न रहने दें, 6.) आयात-निर्यात के मामले में शत-प्रतिशत बराबरी यानि 1:1 का अनुपात अपनायें, 7.) ‘राष्ट्रमण्डल’ की सदस्यता का परित्याग करें, 8.) ‘अमेरीकी प्रभुत्व’ के सामने झुकने से इन्कार करें और 9.) तिब्बत की आजादी का समर्थन करते हुए चीनी धमकियों से डरना छोड़ दें
      मगर मुझे डर है कि ऐसा कुछ नहीं होगा। या तो जनता को बरगला कर तथा राष्ट्रपति महोदय के माध्यम से दाँव-पेंच खेलकर काँग्रेस फिर से सत्ता हथिया लेगी; या फिर, सत्ता थामने के बाद नरेन्द्र मोदी जी वैश्वीकरण, उदारीकरण एवं निजीकरण के अगले चरणों को लागू करने में अपनी सारी ताकत झोंक देंगे, ताकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ और देशी पूँजीपति/उद्योगपति जबर्दस्त मुनाफा कमा सके!
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      मैं आशा करता हूँ कि मेरे उपर्युक्त डर गलत साबित हों; अन्ना हजारे के नेतृत्व में 'लोकपाल' बने तथा भ्रष्टाचार पर लगाम लगे; स्वामी रामदेव के नेतृत्व में कालेधन का राष्ट्रीयकरण हो तथा देश का नवनिर्माण हो; और नरेन्द्र मोदीजी के नेतृत्व में भारत एक खुशहाल, स्वावलम्बी एवं शक्तिशाली देश बने। अगर ऐसा होता है, तो इस देश में मुझसे ज्यादा खुश कोई और नहीं हो सकता।
      मगर मुझे डर है कि मेरे उपर्युक्त डर कहीं सही न साबित हो जायें! अगर ऐसा होता है, तो मेरा अनुमान कहता है कि 2017 तक देश की स्थिति बहुत खराब हो जायेगी।
      स्थिति खराब होने के बाद दो बातें हो सकती हैं- 1.) सब कुछ यूँ ही चलता रहे- क्योंकि भारतीय आम आदमी की सहन शक्ति असीम होती है; 2.) हो सकता है आम आदमी का विश्वास सरकार, व्यवस्था और कानून से उठ जाये और वह सत्ता के खिलाफ बगावत कर दे।
      पहली स्थिति में मेरे पास कहने को कुछ नहीं है। दूसरी स्थिति पैदा होने पर मैं इस देश का नेतृत्व करना चाहूँगा।
      मेरी योजना स्पष्ट है- लाखों की संख्या में लामबन्द होकर संसद का घेराव किया जायेगा, इस दौरान पुलिस एवं अर्द्धसैन्य बल नागरिकों पर गोली नहीं चलायेंगे, सेनायें तटस्थ रहेंगी, राष्ट्रपति महोदय एक आम आदमी को दस वर्षों के लिए प्रधानमंत्री नियुक्त करेंगे, उसके मार्गदर्शन के लिए एक चाणक्य सभा गठित की जायेगी और संसदीय प्रणाली को दस वर्षों के लिए निलम्बित किया जायेगा।
इस भावी दस वर्षीय चन्द्रगुप्तशाही के लिए बाकायदे घोषणापत्र तैयार है- http://jaydeepmanifesto.blogspot.in/ 
अभी तो मेरा यह घोषणापत्र आप सबको ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने लगेंगे’, मगर 2017 में अगर हालात बिगड़ जाये, तो मुझे याद कर लीजियेगा...
... मैं कोई गया वक्त नहीं हूँ कि आ न सकूँ... 
      ईति। 

1 टिप्पणी:

  1. आपका लेख पढ़ कर अच्छा लगा पर मैं कहूंगा की आपका दूसरा विकल्प अन्ना हजारे का तो कांग्रेस की राजनीती से ख़तम हो गया, रामदेव की प्रथिष्ट रामलीला कांड के बाद ख़तम ही समझो अब बचा पहला विकल्प नरेंदर मोदी का तो अभी तो मेरी उम्मीद वही है अगर भगवान ना करे फिर से कांग्रेस सत्ता मैं आ गई तो फिर जो आपने कहा उसी पर अमल करना पड़ेगा नहीं तो हम हमेशा के लिए इस देश को खो देंगे. जय हिंद

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